दुनियां के जितने संभावित प्रपंच
तुम्हारे झोले में हैं गुरुवर
और नहीं कहीं -- भूतो न भविष्यति
नेतृत्व की अनथक, अदम्य ललक
जो तुममें है
वह भी दुर्लभ है कहीं अन्यत्र
यह ललक लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग नहीं
लक्ष्य का ठोस प्रतिरूप है
गुरुवर यह सब तुम्हारा ही
जीवन दर्शन है मंत्र है
और हम –
अपनी क्या बात करें
हमारा भी कोई सानी नहीं
तुम्हारे होने की असली वजह हम ही हैं
जितना बडा प्रपंचकारी हो
हमें जाने क्यों वही भाता है
सीधा सरल इंसान हमे कहां रास आता है
महान लोकतंत्र के समर्थन में
हमारा वोट सदा उसी को जाता है
तुम्हारे बडप्पन के बिम्ब में उभरता बौना
हमारे मानस में प्रश्रय पाता है
तुम्हारे चमचे, पिछलग्गू
कहीं विदेश से नहीं आते गुरुवर
इस उपजाऊ मिट्टी में उग पाते हैं
न होते आप तो हम अकेले क्या कर पाते
हमारे बिना तुम्हारे कदम भी कब के डगमगा जाते
हम ही हैं जो साये की तरह साथ हैं
आपके दो नहीं, चार हाथ हैं
सोच की मौलिकता आप की है
उसे धकेलते हमारे हाथ हैं
सुना है शून्य के खोजी हैं हम
सांसारिकता में पूरी तरह लिप्त
जोगी-वेश में भोगी हैं हम
चरैवेति, आप चलो, हम पीछे आते हैं
देश का हाल क्या है कौन जाने
लगता है उसे भी हम चर गये
वैसे भी बेकार की चिन्ता में हम
न पहले वक्त गंवाते थे
न अब ही गंवाते हैं
चरैवेति, आप चलते चलो
हम पीछे आते हैं.
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