Wednesday, January 18, 2012

जीवन


 
जीवन

यह काया धूप में नहीं

अंगारों में पकी है

 इसका  एक-एक परमाणु

जन्मा है नक्षत्रीय गर्भ में

और जला है अंगारे सा

तब जाकर ढली है ये कायनात !

विद्युत और चुम्बीय बलों से उभरा है

अणुवों का जटिल जैविक विन्यास

और किन्ही प्रोटीनी विन्यासों में

उभर कर आया है जीवन.

बडी लम्बी है दास्तान

कहीं की ईट कहीं का रोडा

भानमती ने कहां कहां से जोडा

ढला कैसे कैसे तापमानों में

फौलाद भी क्या ढला होगा

जैसे ढला है जीवन.

रह रह कर सारी बात

रग-रग में घूम जाती है

और कायनात अपनी ही करनी पर

रोती है कभी, तो कभी

झूम-झूम गाती है.

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